Sunday, 9 December 2012

पाप का पौधा





|||उन लोगों को समर्पित जो किसी मनुष्य की जान लेने से नहीं हिचकते |||

"" ऐसा नहीं की मार कर... बस नरक मे ही जाओगे 
अंत अनंत काल तक....... पाने को तरस जाओगे ""

दर्द दूसरों को देकर ....खुश भी था हुआ कभी 
नींद दूसरों की लेकर..... चैन से सोया कभी 
धोखा दिया था दूसरों को...... पर खुद को ही तूने ठगा 
लूटने गया था उठकर....... खुद के ही घर मे जा घुसा 

नफरत के दो बीज मिले क्या ......उन्हें ही तू घर ले आया 
इतने घरोंदों को जलाया.....  कि खाद मे भी राख ही लाया 
घर है तू हरपाल जलाता..... पानी भी कहाँ से पाता 
इसलिए पानी के बदले..... खून से ही सींच पाया 

बिन उजाले की झलक के..... इस अँधेरे की तलब से 
पाप का पौधा बनाया......... पाप का पौधा बनाया 

उन दानो को पौधा बनाने का कसूर तेरा ही था 
इस शतरंज की बिसाद पर तू बस एक प्यादा ही है 
तेरी ही क़ुरबानी से जीतेगा फिर राजा ही है 
तेरे ही कन्धों पर रखकर..... दागी गयी थी गोलियां 
तेरे ही कहने पर खेली....... खून की येह होलियाँ 
फिर सुबह हो इस आस मे..... रातें भी अब रोने लगीं 
दिन तोह छोटे हो गए थे ......रातें भी अब छोटी लगीं 
मानो अँधेरे को भी खुदसे .............अब घुटन होने लगी 
मानो अँधेरे को भी खुदसे.............. अब घुटन होने लगी ||



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