कर्म कर करता ही चल ...
बस यह मंत्र रमता ही चल ।।
यह जिस्म तेरा नाव है .....
और मन ही एक पतवार थी ...
क्या सोचा तूने...... रुक गया
तोह थम गया ......संसार भी
संसार एक ऐसी है धारा
जिस मे बहता जग है सारा
सबकी आँखों मे एक सपना
उस किनारे का नज़ारा ..........
तू बह गया अभिमान मे
और खो गया तूफ़ान मे
नाव तोह........ बहती है बस
जहाँ राह दी........ पतवार ने
अब चलो थको नहीं
इस राह पर रुको नहीं
जो फूल बिखरे राह मे
उनके लिए झुको नहीं
कर्म कर करता ही चल ...
बस यह मंत्र रमता ही चल ।।
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