
दर्द एक नदिया है ................मीलों तक है पसरी जो यहाँ ........
पार करने की तोह ठानी .......हिम्मत भी उतनी थी कहाँ ...
एक किनारे हम खड़े थे ........कोई नाविक आ मिले
उस किनारे तक तोह अपने साथ हमको ले चले
तूफ़ान भी था अब उठा ......नदिया का पानी चढ़ गया
घबराता मै बस यू खड़ा ........कि एक नाविक मिल गया
मीलों का था जो फासला........ वोह था अब मिट सा गया
दर्द की नदिया का मंज़र........ भी था अब धूमिल हुआ
उस किनारे की झलक को देखकर कुछ खुश हुआ ||
उस किनारे की झलक को देखकर कुछ खुश हुआ ||
इतने मे नाविक भी तीखे स्वर मे हमसे कह चला
जो आज था मै मिल गया .........सफ़र यह तुमने तय किया
पर कल की सोचो अब तनिक......... जब पास न हमको पाओगे
उस भयावह शाम मे............ क्या उस पार जा पाओगे
इसलिए कहता हूँ तुमसे ...........तैरना भी सीख लो
नाव और पतवार की ..............मुझ नाविक से क्यूँ तुम भीख लो
नाविक भी एक इंसान है तूफ़ान मे खो जायेगा
एक नाविक जायेगा तोह एक नाविक आएगा
उस किनारे और भी हैं जिनको है तुम सिख्लाओगे
नदी न रोक पायेगी तुम सागर भी लांघ जाओगे ||
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