Sunday, 9 December 2012

नादान हूँ इतना नहीं



          
नादान हूँ इतना नहीं....... कि मन की भी न कह सकूँ
अरमान भी ऐसा नहीं..... कि दर्द दूसरों का लूँ 
दर्द का समंदर अन्दर दबा कर क्या करूँ 
कागज़ कलम है सामने........ तोह क्यूँ न फिर बयां करूँ
कबसे रखा था अन्दर .....इस दर्द को दबाकर
मानो बस जी रहा था ......मकसद इसे बनाकर
इतने समय तक क्यूँ मै ....चुपचाप बैठा था
यह दर्द का सागर .....क्यूँ इतना शांत रहता था 

एक वक़्त होता है ......हर बात को लाने का 
सन्नाटा संकेत होता है....... तूफ़ान के आने का 
दर्द-ए -सागर  ये मेरा लहरें भी है मेरी 
बोल हैं ये मेरे......... कविता भी है मेरी 

जब तक मन यह रोयेगा....... सागर यूँ भरता जायेगा 
कहर बरपाने को आतुर...... यह लहरों का बाण चलायेगा 
पर दर्द के इस सागर मे........ इक डर भी बढता जायेगा 
अपना ही कोई इस तूफ़ान मे बहता ही चला जायेगा 
बहता ही चला जायेगा ।।





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