सुख दुःख का तराजू ......
जिन्दगी के रंग है कितने .........जीने के भी ढंग है कितने
जितने है चेहरे शहर मे........... रास्ते भी होंगे उतने
जिन्दगी का दायरा......... लम्बा है इतना भी नहीं
जिन रास्तों को चुन लिया........ बस खो गए उन पर कहीं
संसार मे आते है हम .........सुख-दुःख का तराजू लिए
जिन्दगी चलती नही....... बिना इनका व्यापार किये
दोष तोह उन राहों का था .........जिन पर थे हम चल दिए
किसी से हमने सुख लिया ........तोह किसी को दुःख थे दे चले
दूसरों की उस ख़ुशी मे कुछ तेरा भी हाथ था
सुख तोह अपना दे दिया....... फिर दुःख से क्यूँ है भागता
सुख दुःख के इस तराजू मे ........जब सुख का है वजन बड़ा
मोल सुख का गिरना ही था ........खरीदारों का फिर तांता लगा
जो खरीदे सुख थे हमसे ........कल व्यापारी बन जायेंगे
दुःख वोह झोली मे लेंगे........ सुख खरीद हम लायेंगे ||
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