Sunday, 9 December 2012

मेरा प्रतिबिम्भ



आज बचे हो लेकिन शायद कल न बच पाओगे 
जिन्दगी की इस दौड़ को तुम कभी ना जीत पाओगे 
मगर अब हताश होने से क्या 
न तो यह देह तेरा था और न ही यह संसार 
तेरा तो था कुछ लम्हों का साथ 
जिन्हें तू हमेशा करता था बेकार 

छोडो भी अब...... क्यूँ इतना शरमाते हो 
तुमारा ही प्रतिबिम्भ है....... जिससे तुम घबराते हो 
उठो चलो आगे बड़ो........ देर हो गयी तोह क्या गम है 
शुभ प्रभात भी तभी हुआ है...... जब हटा घनघोर तम है 

.....आगे निकल गए इतना सब .......कैसे पीछा कर पाऊँगा 
......क्यारी तोह मै पाट भी देता ........खायी कहाँ से पाटुंगा 

क्यारी बनायीं इंसान ने...... उसे पाटने का क्या अहम् है 
खायी बनायीं भगवान् ने ....जो नाका उसमे ही दम है 

सोचते होगे कौन हूँ मै ......इतना क्यूँ समझाता हूँ 
क़र्ज़ क्या है ऐसा ऊपर....... जिसे उतारना चाहता हूँ 

तू हसता था तू रोता था 
करवट बदल बदल सोता था 
बेचैनी की उन रातों मे .....मेरी सुन कर खुश होता था 
धूप छाव मे चलते चलते .....तू इतना थक जाता था 
खोल चारपाई ली अंगड़ाई .....भूल कर सब सो जाता था 

निर्भय निडर पथिक ओ नश्वर 
धूप छाव से डरता था 
तुझे बताया फिर समझाया 
वीर रस तब अन्दर भर पाया 
कर्मठता तेरे अन्दर थी ......उसे जगाना मुझे आता था 
तेरे हर वोह लक्ष्य के पीछे ......तुझे भगाना मुझे आता था 

शब्दकोष मे कमी हो मेरे ........मूक नहीं बन जाऊँगा 
जब जब गिरेगा तू भूमि पर .....तुझे उठाने आऊँगा 

तेरे अंतर्मन मे बसता हूँ 
प्रतिबिम्भ उसका कहलाऊँगा ।।

तेरे अंतर्मन मे बसता हूँ 
प्रतिबिम्भ उसका कहलाऊँगा ।।




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