Sunday, 9 December 2012



 
           बुलबुला एक झाग का ....


बार बार हुंकार है भरने की अब आदत हो गयी 
रास्ता जैसा भी हो ....चलने की अब आदत हो गयी 
ऐसा नहीं कि रास्तों की पहचान से महरूम हूँ 
ऐसा नहीं कि .......कोई झूठी आन से मजबूर हूँ 
फिर रास्ते की उस चमक से...... क्यूँ मोहब्बत हो गयी 
फिर रास्ते की उस चमक से...... क्यूँ मोहब्बत हो गयी 

बुलबुला एक झाग का ........जो उड़ चला आकाश मे 
नाज़ुक सि एक परत के भीतर..... ले हवा कुछ साथ मे 
मौसम सुहाना सा लगे ........या हो गरज तूफ़ान की 
उसने तोह की परवाह थी बस......... फिर से नयी उड़ान की 

पर जब जब है वोह उंचाईयों मे मदहोश होता जायेगा 
वक़्त की एक मार होगी ........अस्तित्व ही मिट जायेगा 
जिस हवा को ले उड़ा......... वापस है फिर लौटाएगा 
यह पुराना सत्य था....... फिर भी न समझ पायेगा ||


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